बाढ़

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बहुत समय के बाद, संसार में बहुत से लोग रहते थे। वे बहुत दुष्ट और उपद्रवी हो गए थे। यह इतना बुरा था कि परमेश्वर ने एक बड़ी बाढ़ से इस पूरे संसार को नष्ट करने का निर्णय लिया।

परन्तु परमेश्वर नूह से प्रसन्न था। वह दुष्ट मनुष्यों के बीच रहने वाला एक धर्मी व्यक्ति था। परमेश्वर ने नूह को बताया कि वह एक विशाल बाढ़ को लाने वाला है। इस कारण, उसने नूह से एक बड़ी नाव बनाने के लिए कहा।

परमेश्वर ने नूह को लगभग 140 मीटर लंबी, 23 मीटर चौड़ी और 13.5 मीटर ऊँची नाव बनाने के लिए कहा। नूह को उसे लकड़ी से बनाना था और उसमें तीन तल, बहुत से कमरे, एक छत और एक खिड़की बनानी थी। वह नाव नूह, उसके परिवार, और भूमि के हर प्रकार के जानवरों को उस बाढ़ से सुरक्षित रखेगी।

नूह ने परमेश्वर की बात मानी। उसने और उसके पुत्रों ने वैसी ही नाव बनाई जैसी परमेश्वर ने बताई थी। क्योंकि वह नाव बहुत बड़ी थी इसलिए उसे बनाने में कई वर्ष लगे। नूह ने लोगों को आने वाली बाड़ के विषय में चेतावनी दी और उनको परमेश्वर की ओर फिरने के लिए कहा, परन्तु उन्होंने उस पर विश्वास नहीं किया।

परमेश्वर ने नूह और उस के परिवार को अपने लिए और जानवरों के लिए पर्याप्त भोजन इकट्ठा करने का आदेश भी दिया। जब सब कुछ तैयार था, तो परमेश्वर ने नूह से कहा कि यह समय उसके, उसकी पत्नी के, उसके तीन पुत्रों के, और उनकी पत्नियों के – कुल मिलाकर आठ जनों के नाव में जाने का था।

परमेश्वर ने हर जानवर और पक्षी के नर और मादा को नूह के पास भेजा ताकि वे नाव में जा सकें और बाढ़ के दौरान सुरक्षित रह सकें। परमेश्वर ने ऐसे हर प्रकार के जानवरों के सात नर और सात मादाओं को भेजा जिनको बलि चढ़ाने के लिए उपयोग किया जा सके। जब वे सब नाव में पहुँच गए तो स्वयं परमेश्वर ने नाव के द्वार को बंद कर दिया।

तब बारिश होना आरम्भ हुआ, और बारिश होती गई, होती गई। बिना रुके चालीस दिन और चालीस रातों तक बारिश होती रही। सारे संसार की हर एक चीज, यहाँ तक कि ऊँचे से ऊँचे पर्वत भी पानी में डूब गए।

सूखी भूमि पर रहने वाली हर एक चीज मर गई, उन लोगों और जानवरों को छोड़ कर जो नाव में थे। वह नाव पानी पर तैरती रही और नाव के भीतर की हर एक चीज को डूबने से सुरक्षित रखा।

बारिश के रुक जाने के बाद, पाँच महीने तक वह नाव पानी पर तैरती रही, और उस समय के दौरान पानी कम होने लगा था। तब एक दिन वह नाव एक पर्वत की चोटी पर जा टिकी, लेकिन संसार अभी भी पानी से ढका हुआ था। तीन महीने के बाद, पर्वतों की चोटियाँ दिखाई देने लगी थीं।

फिर और चालीस दिनों के बाद, नूह ने एक कौवे को यह देखने के लिए बाहर भेजा कि क्या पानी सूख गया था। वह कौवा सूखी भूमि की खोज में इधर-उधर उड़ता रहा, परन्तु उसे ऐसा कोई स्थान न मिला।

फिर बाद में नूह ने एक कबूतरी को बाहर भेजा। परन्तु उसे भी कोई सूखी भूमि न मिली, इसलिए वह नूह के पास वापिस आ गई। एक सप्ताह के बाद उसने उस कबूतरी को फिर से भेजा, और वह अपने चोंच में जैतून की एक शाखा लिए हुए वापिस आई। पानी घट रहा था, और पौधे फिर से उगने लगे थे।

नूह ने एक सप्ताह और प्रतीक्षा की और तीसरी बार उस कबूतरी को बाहर भेजा। इस बार, उसे ठहरने का स्थान मिल गया और वह वापिस नहीं आई। पानी सूख रहा था।

दो महीने बाद परमेश्वर ने नूह से कहा, “अब तू और तेरा परिवार और सारे जानवर नाव से निकल आओ। बहुत सारी संतानें और पोते-परपोते उत्पन्न करो और पृथ्वी को भर दो।” अतः नूह और उसका परिवार नाव से बाहर निकल आया।

नूह के नाव से बाहर आने के बाद, उसने एक वेदी बनाई और बलि के लिए उपयोग किए जा सकने वाले हर प्रकार के जानवरों में से कुछ को लेकर बलि चढ़ाई। परमेश्वर उस बलि से प्रसन्न हुआ और नूह और उसके परिवार को आशीष दी।

परमेश्वर ने कहा, “मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले बुरे कामों के कारण मैं फिर कभी भूमि को श्राप नहीं दूँगा या बाढ़ द्वारा संसार को नष्ट नहीं करूँगा, हालाँकि मनुष्य अपने बचपन के समय से ही पापी हैं।

फिर परमेश्वर ने अपनी वाचा के चिन्ह के रूप में प्रथम मेघधनुष को बनाया। जब कभी भी आकाश में मेघधनुष दिखाई देता है, तो परमेश्वर स्मरण करेगा कि उसने क्या प्रतिज्ञा की है और वैसे ही उसके लोग भी स्मरण करेंगे।

उत्पत्ति अध्याय 6-8 से एक बाइबल की कहानी

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पुराने नियम से बाइबल की कहानियाँ / Old Testament Stories

पाप संसार में प्रवेश करता है

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आदम और उसकी पत्नी परमेश्वर द्वारा उनके लिए बनाए गए उस सुंदर बगीचे में रहते हुए बहुत खुश थे। उनमें से कोई भी कपड़े नहीं पहनता था, फिर भी इस बात ने उनमें से किसी को शर्मिन्दा नहीं किया था, क्योंकि संसार में पाप नहीं था। वे अक्सर उस बगीचे में टहला करते थे और परमेश्वर से बात किया करते थे।

लेकिन उस बगीचे में एक साँप था। वह बहुत धूर्त था। उसने उस स्त्री से पूछा, “क्या सचमुच परमेश्वर ने तुमसे इस बगीचे के किसी भी पेड़ के फल को खाने से मना किया है?”

उस स्त्री ने उत्तर दिया, “परमेश्वर ने हम से कहा है कि हम उस भले और बुरे के ज्ञान के पेड़ के अलावा किसी भी पेड़ के फल को खा सकते हैं। परमेश्वर ने हम से कहा है कि अगर तुमने उस फल को खाया या उसे छुआ भी, तो तुम मर जाओगे।”

उस साँप ने स्त्री को जवाब दिया, “यह सच नहीं है! तुम नहीं मरोगे। परमेश्वर जानता है कि जैसे ही तुम उस फल को खाओगे, तुम परमेश्वर के समान हो जाओगे और उसके समान भले और बुरे को समझने लगोगे।”

उस स्त्री ने देखा कि वह फल मनभावना था और स्वादिष्ट दिखाई देता था। वह भी समझदार बनना चाहती थी, इसलिए उसने फल को तोड़ कर खा लिया। फिर उसने अपने पति को जो उसके साथ था वह फल दिया और उसने भी खा लिया।

अचानक ही, उनकी आँखें खुल गईं, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे थे। उन्होंने पत्तों को एक साथ सिलकर उनके कपड़े बनाकर उनसे अपने शरीरों को ढाँकने की कोशिश की।

तब पुरुष और उसकी पत्नी ने उस बगीचे में टहलते हुए परमेश्वर की आवाज को सुना। वे दोनों परमेश्वर से छिप गए। तब परमेश्वर ने पुरुष को आवाज लगाई, “तू कहाँ है?” आदम ने जवाब दिया, “मैंने आपको बगीचे में टहलते हुए सुना, और मैं डर गया था, क्योंकि मैं नंगा था। इसलिए मैं छिप गया।”

फिर परमेश्वर ने पूछा, “तुझे किसने बताया कि तू नंगा है? क्या तूने वह फल खाया है जिसे खाने के लिए मैंने तुझे मना किया था?” पुरुष ने जवाब दिया, “आपने मुझे जो यह स्त्री दी है इसने ही मुझे वह फल दिया।” तब परमेश्वर ने स्त्री से पूछा, “तूने यह क्या किया है?” वह स्त्री बोली, “साँप ने मुझे धोखा दिया है।”

परमेश्वर ने साँप से कहा, “तू श्रापित है! तू अपने पेट के बल चला करेगा और मिट्टी चाटेगा। तू और यह स्त्री एक दूसरे से घृणा करेंगे, और तेरी संतानें और उसकी संतानें भी एक दूसरे से घृणा करेंगी। इस स्त्री का वंशज तेरे सिर को कुचलेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।”

तब परमेश्वर ने स्त्री से कहा, “मैं तेरे संतान जन्माने को बहुत पीड़ादायक करूँगा। तू अपने पति से लालसा करेगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।”

परमेश्वर ने पुरुष से कहा, “तूने अपनी पत्नी की सुनी है और मेरी आज्ञा नहीं मानी है। इसलिए भूमि श्रापित हुई है, और तुझे भोजन उगाने के लिए कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता होगी। उसके बाद तू मर जाएगा, और तेरा शरीर मिट्टी में मिल जाएगा।” उस पुरुष ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा, जिसका अर्थ है “जीवन देने वाली”, क्योंकि वह सब जातियों की माता होगी। और परमेश्वर ने आदम और हव्वा को जानवर की खाल से बने कपड़े पहनाए।

फिर परमेश्वर ने कहा, “अब भले और बुरे को जानने से मनुष्य हमारे समान हो गया है, इसलिए उनको उस जीवन के पेड़ के फल को नहीं खाने देना चाहिए कि वे सदा के लिए जीवित रहें।” इसलिए परमेश्वर ने आदम और हव्वा को उस बगीचे से बाहर निकाल दिया। और परमेश्वर ने किसी को भी उस जीवन के पेड़ के फल को खाने से रोकने के लिए उस बगीचे के प्रवेशद्वार पर शक्तिशाली स्वर्गदूतों को रख दिया।

उत्पत्ति अध्याय 3 से एक बाइबल की कहानी

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पुराने नियम से बाइबल की कहानियाँ / Old Testament Stories

सृष्टि

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इस प्रकार से आरम्भ में परमेश्वर ने सब चीजों की सृष्टि की। उसने छः दिनों में संसार की और जो कुछ उसमें है उन सब की सृष्टि की। परमेश्वर द्वारा पृथ्वी की रचना के बाद वह अंधकारमय और खाली थी, क्योंकि अभी तक परमेश्वर ने उसमें किसी भी चीज को नहीं बनाया था। परन्तु परमेश्वर का आत्मा पानी के ऊपर मंडराता था।

फिर परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो!” और उजियाला हो गया। परमेश्वर ने देखा कि उजियाला अच्छा है और उसे “दिन” कहा। और उसने उसे अंधकार से अलग किया जिसे उसने “रात” कहा। परमेश्वर ने सृष्टि करने के पहले दिन में उजियाले की रचना की।

सृष्टि करने के दूसरे दिन में परमेश्वर ने कहा, “पानी के ऊपर एक अंतर हो।” और एक अंतर हो गया। परमेश्वर ने उस अंतर को “आकाश” कहा।

तीसरे दिन में परमेश्वर ने कहा, “पानी एक स्थान पर इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।” उसने सूखी भूमि को “पृथ्वी” कहा और पानी को “समुद्र” कहा। परमेश्वर ने देखा कि जो उसने बनाया था वह अच्छा था।

फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी सब प्रकार के पेड़ और पौधे उगाए।” और ऐसा ही हुआ। परमेश्वर ने देखा कि जो उसने बनाया था वह अच्छा था।

सृष्टि करने के चौथे दिन में परमेश्वर ने कहा, “आकाश में ज्योतियाँ हों।” और सूर्य, चंद्रमा और तारागण प्रकट हुए। परमेश्वर ने उनको पृथ्वी पर प्रकाश देने के लिए और दिन और रात, मौसमों और वर्षों में भेद करने के लिए बनाया। परमेश्वर ने देखा कि जो उसने बनाया था वह अच्छा था।

पाँचवें दिन परमेश्वर ने कहा, “पानी जीवित प्राणियों से भर जाये और आकाश में पक्षी उड़ने लगें।” इस प्रकार से उसने पानी में तैरने वाले सब जन्तुओं को और सभी पक्षियों को बनाया। परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा था और उसने उनको आशीष दी।

सृष्टि के छठवें दिन में परमेश्वर ने कहा, “भूमि पर रहने वाले सभी प्रकार के जानवर हों।” और परमेश्वर के कहे अनुसार ऐसा हो गया। कुछ जानवर पालतू थे, कुछ भूमि पर रेंगने वाले, और कुछ जंगली जानवर थे। और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा था।

फिर परमेश्वर ने कहा, “आओ हम मनुष्य को अपने स्वरूप में और अपनी समानता में बनाएँ। वे पृथ्वी पर और सब जानवरों पर अधिकार रखें।”

अतः परमेश्वर ने कुछ मिट्टी लेकर उससे मनुष्य को बनाया और उसमें जीवन के श्वांस को फूँक दिया। इस मनुष्य का नाम आदम था। परमेश्वर ने एक बड़ा बगीचा लगाया जहाँ आदम रह सकता था, और उसकी देखभाल करने के लिए आदम को वहाँ रख दिया।

उस बगीचे के मध्य में परमेश्वर ने दो विशेष पेड़ लगाए – जीवन का पेड़ और भले और बुरे के ज्ञान का पेड़। परमेश्वर ने आदम से कहा कि वह उस बगीचे के जीवन के पेड़ और भले और बुरे के ज्ञान के पेड़ को छोड़ कर अन्य किसी भी पेड़ के फल को खा सकता है। अगर उसने उस पेड़ का फल खाया तो वह मर जाएगा।

फिर परमेश्वर ने कहा, “पुरुष के लिए अकेला रहना अच्छा नहीं है।” लेकिन कोई भी जानवर आदम का साथी न हो सका।

इसलिए परमेश्वर ने आदम को गहरी नींद में डाल दिया। फिर परमेश्वर ने आदम की एक पसली लेकर उससे एक स्त्री की रचना की और उसे आदम के पास लेकर आया।

जब आदम ने उसे देखा तो उसने कहा, “कम से कम यह तो मेरे जैसी है! यह ‘स्त्री’ कहलाएगी, क्योंकि यह पुरुष में से बनाई गई है।” इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ देता है और अपनी पत्नी के साथ एक हो जाता है।

परमेश्वर ने पुरुष और स्त्री को अपने स्वरूप में बनाया। उसने उनको आशीष दी और उनसे कहा, “बहुत सारी संतानें और पोते-परपोते उत्पन्न करो और पृथ्वी को भर दो!” और परमेश्वर ने देखा कि जो कुछ भी उसने बनाया था वह बहुत अच्छा था, और वह उन सब से बहुत प्रसन्न था। यह सब कुछ सृष्टि करने के छठवें दिन हुआ था।

जब सातवाँ दिन आया तो जो कुछ परमेश्वर कर रहा था उसने उस सारे काम को समाप्त किया। उसने सातवें दिन को आशीष दी और उसे पवित्र ठहराया, क्योंकि उस दिन उसने सब चीजों की सृष्टि करने को समाप्त किया था। इस प्रकार से परमेश्वर ने संसार की और जो कुछ उसमें है उन सब की सृष्टि की।

उत्पत्ति अध्याय 1-2 से बाइबल की एक कहानी

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पुराने नियम से बाइबल की कहानियाँ / Old Testament Stories

भजन संहिता 23 – प्रभु मेरा चरवाहा है

प्रभु मेरा चरवाहा है,
मुझ-भेड़ को अभाव न होगा।

वह मुझे हरी-भरी भूमि पर विश्राम कराता है;
वह मुझे झरने के शांत तट पर ले जाता है;
वह मुझे नवजीवन देता है;
वह अपने नाम के लिए
धर्म के मार्ग पर मेरा नेतृत्‍व करता है।

यद्यपि मैं घोर अंधकारमय घाटी से
गुजरता हूँ,
तो भी अनिष्‍ट से नहीं डरता,
क्‍योंकि हे प्रभु, तू मेरे साथ है।
तेरी सोंठी, तेरी लाठी मुझे सहारा देती हैं।

मेरे शत्रुओं की उपस्‍थिति में
तू मेरे लिए खाने की मेज़ लगाता है;
तू तेल से मेरे सिर का अभ्‍यंजन करता है,
मेरा प्‍याला छलक रहा है।

निश्‍चय भलाई और करुणा
जीवन भर मेरा अनुसरण करेंगी;
और मैं प्रभु के घर में
युग-युगांत निवास करूंगा।


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भजन संहिता 116 – मैं प्रभु से प्रेम करता हूं

मैं प्रभु से प्रेम करता हूं,
क्‍योंकि उसने मेरी वाणी और
विनती सुनी है।
उसने मेरी ओर ध्‍यान दिया है,
अत: मैं अपने जीवन-भर उसको ही
पुकारूंगा।

मुझे संकट और शोक सहना पड़ा।
तब मैंने प्रभु को उसके नाम से पुकारा,
‘हे प्रभु, तू मेरे प्राण को छुड़ा।’

प्रभु कृपालु और धर्ममय है;
हमारा परमेश्‍वर दयालु है।
प्रभु भोले मनुष्‍यों की रक्षा करता है;
मैं दुर्दशा में था, उसने मुझे बचाया।

ओ मेरे प्राण, अपने नीड़ को लौट आ;
क्‍योंकि प्रभु ने मेरा उपकार किया है।
तूने मेरे प्राण को मृत्‍यु से,
मेरी आंखों को आंसुओं से,
मेरे पैरों को गिरने से बचाया।

मैं जीव-लोक में
प्रभु के समक्ष चलता हूं।
मैं तुझको स्‍तुति-बलि चढ़ाऊंगा,
और प्रभु, तेरे नाम से आराधना करूंगा।


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भजन संहिता 34 – मैं प्रभु को हर समय धन्‍य कहूँगा

मैं प्रभु को हर समय धन्‍य कहूँगा।
मैं निरन्‍तर उसकी स्‍तुति करता रहूंगा।
मेरा प्राण प्रभु पर गर्व करेगा;
दु:खी मनुष्‍य यह सुन कर सुखी होगा।
मेरे साथ प्रभु का गुणगान करो;
हम सब उसके नाम को उन्नत करें।

मैंने प्रभु को खोजा;
और उसने मुझे उत्तर दिया,
उसने मेरे सब भय से मुझे मुक्‍त किया
प्रभु पर दृष्‍टि करो,
तब तुम्‍हारा मुख प्रकाशमय हो जाएगा;
और तुम अपने विश्‍वास के लिए
कभी लज्‍जित न होगे!

इस पीड़ित व्यक्‍ति ने प्रभु को पुकारा,
और प्रभु ने उसकी प्रार्थना सुनी;
प्रभु ने उसके सब संकटों से उसको
बचाया।
जो लोग प्रभु की भक्‍ति करते हैं,
उन्‍हें प्रभु का दूत चारों ओर से घेरे रहता है;
वह उन्‍हें मुक्‍त करता है।

परखकर देखो कि प्रभु कितना भला है।
धन्‍य है वह व्यक्‍ति जो प्रभु की शरण में
आता है।
ओ प्रभु के संतो! प्रभु से डरो।
जो लोग प्रभु से डरते हैं, उन्‍हें अभाव नहीं
होता।


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भजन संहिता 103 – हे मेरी आत्मा, तू यहोवा के गुण गा!

हे मेरी आत्मा, तू यहोवा के गुण गा!

हे मेरी अंग—प्रत्यंग, उसके पवित्र नाम की प्रशंसा कर।

हे मेरी आत्मा, यहोवा को धन्य कह

और मत भूल की वह सचमुच कृपालु है!

उन सब पापों के लिये परमेश्वर हमको क्षमा करता है जिनको हम करते हैं।

हमारी सब व्याधि को वह ठीक करता है।

परमेश्वर हमारे प्राण को कब्र से बचाता है,

और वह हमे प्रेम और करुणा देता है।

परमेश्वर हमें भरपूर उत्तम वस्तुएँ देता है।

वह हमें फिर उकाब सा युवा करता है।

यहोवा खरा है।

परमेश्वर उन लोगों को न्याय देता है, जिन पर दूसरे लोगों ने अत्याचार किये।

परमेश्वर ने मूसा को व्यवस्था का विधान सिखाया।

परमेश्वर जो शक्तिशाली काम करता है, वह इस्राएलियों के लिये प्रकट किये।

यहोवा करुणापूर्ण और दयालु है।

परमेश्वर सहनशील और प्रेम से भरा है।

यहोवा सदैव ही आलोचना नहीं करता।

यहोवा हम पर सदा को कुपित नहीं रहता है।

हम ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किये,

किन्तु परमेश्वर हमें दण्ड नहीं देता जो हमें मिलना चाहिए।

अपने भक्तों पर परमेश्वर का प्रेम वैसे महान है

जैसे धरती पर है ऊँचा उठा आकाश।

परमेश्वर ने हमारे पापों को हमसे इतनी ही दूर हटाया

जितनी पूरब कि दूरी पश्चिम से है।

अपने भक्तों पर यहोवा वैसे ही दयालु है,

जैसे पिता अपने पुत्रों पर दया करता है।

परमेश्वर हमारा सब कुछ जानता है।

परमेश्वर जानता है कि हम मिट्टी से बने हैं।

परमेश्वर जानता है कि हमारा जीवन छोटा सा है।

वह जानता है हमारा जीवन घास जैसा है।

परमेश्वर जानता है कि हम एक तुच्छ बनफूल से हैं।

वह फूल जल्दी ही उगता है।

फिर गर्म हवा चलती है और वह फूल मुरझाता है।

औप फिर शीघ्र ही तुम देख नहीं पातेकि वह फूल कैसे स्थान पर उग रहा था।

किन्तु यहोवा का प्रेम सदा बना रहता है।

परमेश्वर सदा—सर्वदा निज भक्तों से प्रेम करता है

परमेश्वर की दया उसके बच्चों से बच्चों तक बनी रहती है।

परमेश्वर ऐसे उन लोगों पर दयालु है, जो उसकी वाचा को मानते हैं।

परमेश्वर ऐसे उन लोगों पर दयालु है जो उसके आदेशों का पालन करते हैं।

परमेश्वर का सिंहासन स्वर्ग में संस्थापित है।

हर वस्तु पर उसका ही शासन है।

हे स्वर्गदूत, यहोवा के गुण गाओ।

हे स्वर्गदूतों, तुम वह शक्तिशाली सैनिक हो जो परमेश्वर के आदेशों पर चलते हो।

परमेश्वर की आज्ञाएँ सुनते और पालते हो।

हे सब उसके सैनिकों, यहोवा के गुण गाओ, तुम उसके सेवक हो।

तुम वही करते हो जो परमेश्वर चाहता है।

हर कहीं हर वस्तु यहोवा ने रची है। परमेश्वर का शासन हर कहीं वस्तु पर है।

सो हे समूची सृष्टि, यहोवा को तू धन्य कह।

ओ मेरे मन यहोवा की प्रशंसा कर।


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भजन संहिता 33 – प्रभु ने कहा, और वह हो गया

आकाश-मण्‍डल प्रभु के वचन से
और उसकी समस्‍त स्‍वर्गिक सेना,
उसके मुंह की सांस से निर्मित हुई।
प्रभु ने समुद्र के जल को मानो पात्र में एकत्र
किया है; उसने अतल सागरों को भण्‍डार में रखा है।

समस्‍त पृथ्‍वी प्रभु से डरे;
संसार के सब निवासी उसकी भक्‍ति करें।
क्‍योंकि प्रभु ने कहा, और वह हो गया;
उसने आज्ञा दी, और वह स्‍थित हो गया।

प्रभु राष्‍ट्रों के परमार्श को विफल कर देता है;
वह जातियों के विचारों को व्‍यर्थ कर देता है।
प्रभु का परामर्श युग-युगांत स्‍थित रहता है;
उसके हृदय के विचार पीढ़ी से पीढ़ी बने
रहते हैं। धन्‍य है वह राष्‍ट्र जिसका परमेश्‍वर प्रभु है;
धन्‍य हैं वह लोग जिनको प्रभु ने अपनी मीरास
के लिए चुना है।

प्रभु स्‍वर्ग से नीचे निहारता है;
वह समस्‍त मानव-जाति को देखता है;
वह उस स्‍थान से, जहां वह सिंहासन पर
विराजमान है, धरती के समस्‍त निवासियों पर दृष्‍टिपात
करता है। वही उन सब के हृदय को गढ़ता है;
और उनके सब कार्यों का निरीक्षण करता है।
राजा का उद्धार उसकी विशाल सेना से नहीं
होता; वीर पुरुष की मुक्‍ति उसके अपार बल से
नहीं होती।

विजय-प्राप्‍ति के लिए अश्‍व-सेना दुराशा
मात्र है; वह अपनी बड़ी शक्‍ति से भी बचा नहीं
सकती। देखो, प्रभु की दृष्‍टि उन लोगों पर है
जो उससे डरते हैं;
और उन पर है जो उसकी करुणा की प्रतीक्षा करते हैं;
जिससे वह उनके प्राण को मृत्‍यु से
मुक्‍त करे; और अकाल के समय उन्‍हें जीवित रखे।


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व्‍यवस्‍था-विवरण 30,11-20 – हम इस व्‍यवस्‍था के वचनों के अनुसार कार्य कर सकें

गुप्‍त बातें केवल हमारा प्रभु परमेश्‍वर ही जानता है। पर जो बातें प्रकट की गई हैं, उन्‍हें हम और हमारी सन्‍तान सदा-सर्वदा जानेंगे, ताकि हम इस व्‍यवस्‍था के वचनों के अनुसार कार्य कर सकें।

‘देख, मैंने आज तेरे सम्‍मुख जीवन और मृत्‍यु, भलाई और बुराई रख दी है। यदि तू अपने प्रभु परमेश्‍वर की आज्ञाओं का पालन करेगा, जिनका आदेश आज मैं तुझे दे रहा हूँ, यदि तू अपने प्रभु परमेश्‍वर से प्रेम करेगा और उसके मार्ग पर चलेगा, यदि तू उसकी आज्ञाओं, संविधियों और न्‍याय-सिद्धान्‍तों का पालन करेगा, तो तू जीवित रहेगा, और असंख्‍य होगा। प्रभु परमेश्‍वर तुझ को उस देश में, जिस पर अधिकार करने के लिए तू वहाँ जा रहा है, आशिष देगा।

परन्‍तु यदि तेरा हृदय प्रभु की ओर से बदल जाएगा, तू उसकी वाणी नहीं सुनेगा, और दूसरे देवताओं की ओर खिंचकर उनकी वन्‍दना और पूजा करने लगेगा, तो मैं आज यह घोषित करता हूँ, तू निश्‍चय ही पूर्णत: मिट जाएगा। तू उस भूमि पर, जहाँ तू यर्दन नदी को पार कर अधिकार करने जा रहा है, अधिक दिन जीवित नहीं रहेगा।

मैं आज आकाश और पृथ्‍वी को तेरे विरुद्ध साक्षी देने के लिए बुलाऊंगा कि मैंने तेरे सम्‍मुख जीवन और मृत्‍यु, आशिष और अभिशाप रख दिए हैं! इसलिए जीवन को चुन, जिससे तू और तेरे वंशज जीवित रहें, अपने प्रभु परमेश्‍वर से प्रेम करें, उसकी वाणी सुनें और उससे चिपके रहें। यही तेरे जीवन का अभिप्राय है। इस पर ही तेरी दीर्घायु निर्भर है। तब तू उस भूमि पर निवास कर सकेगा, जिसकी शपथ प्रभु ने तेरे पूर्वजों से, अब्राहम, इसहाक और याकूब से खाई थी कि वह उनको प्रदान करेगा।’


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